
होली भारत का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है, जिसे रंगों, प्रेम और भाईचारे के पर्व के रूप में जाना जाता है। यह त्योहार सामाजिक एकता, आपसी सद्भाव और खुशियों का प्रतीक है। पौराणिक कथा के अनुसार, भक्त प्रह्लाद और होलिका की कहानी हमें यह संदेश देती है कि सत्य, विश्वास और भक्ति की हमेशा विजय होती है। इसी कारण होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है।
लेकिन वर्तमान समय में इस पावन पर्व की गरिमा को कुछ लोगों के अनुचित व्यवहार से ठेस पहुंच रही है। होली के नाम पर अश्लील गानों का प्रयोग, अभद्र भाषा का इस्तेमाल, जबरन रंग लगाना, शराब और नशे का सेवन, तथा महिलाओं के साथ छेड़छाड़ जैसी घटनाएँ समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही हैं। “बुरा न मानो, होली है” जैसे वाक्य का गलत उपयोग कर कुछ लोग मर्यादाओं और सामाजिक सीमाओं का उल्लंघन करते हैं।
त्योहारों का मुख्य उद्देश्य लोगों को जोड़ना और खुशियाँ बांटना होता है, न कि किसी को असहज या अपमानित करना। जब होली जैसे पवित्र पर्व पर अश्लीलता और असामाजिक व्यवहार देखने को मिलता है, तो यह हमारी संस्कृति और परंपराओं के मूल्यों को कमजोर करता है। इसका नकारात्मक प्रभाव युवा पीढ़ी पर भी पड़ता है, क्योंकि बच्चे और किशोर जो देखते हैं, वही सीखते हैं।
सोशल मीडिया और कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी अश्लील और भ्रामक कंटेंट के प्रसार ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। इसलिए प्रशासन, समाज और नागरिकों की जिम्मेदारी है कि ऐसे व्यवहार को रोका जाए और सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
परिवार और शिक्षा संस्थानों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। माता-पिता और शिक्षक बच्चों को त्योहारों का सही महत्व और सांस्कृतिक मूल्य समझाएँ। सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदायों को भी जागरूकता अभियान चलाकर शालीन और सम्मानजनक होली मनाने का संदेश देना चाहिए।
होली प्रेम, सम्मान और सकारात्मक ऊर्जा का पर्व है। आइए, हम सभी यह संकल्प लें कि इस त्योहार को उसकी मूल भावना के अनुसार मनाएँगे और किसी भी प्रकार की अश्लीलता या असामाजिक व्यवहार को बढ़ावा नहीं देंगे। तभी होली वास्तव में रंगों, खुशियों और रिश्तों की सच्ची मिठास का प्रतीक बनी रहेगी।
लेखक: पत्रकार विशाल कोरी