बाबा साहेब अंबेडकर की राह पर गोल्डन दास: 14 अप्रैल को ‘मनुस्मृति दहन’ का एलान से सियासत गरम

बिहार: बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक की राजनीति में अपनी बेबाक शैली के लिए चर्चित नेता गोल्डन दास ने एक बड़ा ऐलान कर सियासी हलचल तेज कर दी है। उन्होंने घोषणा की है कि आगामी 14 अप्रैल, यानी अंबेडकर जयंती के दिन वे ‘मनुस्मृति’ का दहन करेंगे। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक बहस छिड़ गई है।

क्या है पूरा मामला?

गोल्डन दास का कहना है कि वे डॉ. भीमराव अंबेडकर के अधूरे मिशन को आगे बढ़ाने के लिए यह कदम उठा रहे हैं। उनके अनुसार, “जिस विचारधारा ने बहुजन समाज को सदियों तक दबाकर रखा, उसका विरोध जरूरी है।” उन्होंने इसे केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश का हिस्सा बताया है।

इतिहास से जुड़ा है यह कदम

मनुस्मृति दहन का यह विचार नया नहीं है। इतिहास के पन्नों में दर्ज महाड़ सत्याग्रह के दौरान 25 दिसंबर 1927 को डॉ. अंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था। उन्होंने इसे सामाजिक असमानता और भेदभाव का प्रतीक बताया था।
गोल्डन दास का यह ऐलान उसी ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है।

14 अप्रैल का दिन क्यों?

विशेषज्ञों के अनुसार, अंबेडकर जयंती के दिन इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करना एक स्पष्ट राजनीतिक और सामाजिक संदेश है। एक ओर भारत का संविधान है, जो समानता और अधिकारों की बात करता है, वहीं दूसरी ओर वे परंपराएं हैं जिनका विरोध किया जा रहा है।
गोल्डन दास इस कार्यक्रम के जरिए वैचारिक टकराव को खुलकर सामने लाना चाहते हैं।

क्या बोले गोल्डन दास?

गोल्डन दास ने अपने बयान में कहा:

“हम बाबा साहेब के सिपाही हैं। जो किताब हमें इंसान नहीं मानती, उसे हम स्वीकार नहीं कर सकते। 14 अप्रैल को धुआं भी उठेगा और बदलाव का संदेश भी जाएगा।”

प्रशासन और राजनीति में हलचल

इस घोषणा के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है। संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखी जा रही है। वहीं, विपक्ष और अन्य राजनीतिक दलों ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं।

आगे क्या?

अब सवाल यह है कि क्या यह कदम दलित राजनीति को नई दिशा देगा या फिर यह केवल प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह जाएगा। फिलहाल, 14 अप्रैल को होने वाले इस कार्यक्रम पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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